Wednesday, 17 September 2014

B-105/18.9.14

Releasing on 2nd oct,my up coming book "Manat-The God Father".

I am sharing it on my blog also.

 पुस्तक से-

"कमलेश यह भी भलीभांति जानता था कि महराज से “व्यवहारिक ज्ञान“ सीखने के लिए कुछ भी नहीं था। “व्यवहारिक ज्ञान“ का विश्वविद्यालय तो कमलेश स्वयं था। यह पाठ तो वह स्वयं महराज को पढ़ा सकता है। जीवन से बड़ी पाठशाला कोई नहीं है। जीवन में जितने संघर्ष होते हैं, उतना ही व्यवहारिक ज्ञान मनुष्य को होता है। कमलेश का जीवन तो संघर्षों का पर्याय था। जीवन का कोई ऐसा कष्ट, झंझावात, आपदा नहीं थी, जो उसने न झेली हो। लगभग प्रत्येक प्रकार के मनुष्यों से उसका सामना पड़ चुका था। पग-पग पर धोखा खाने के बाद अब जीवन में कोई ऐसी विपत्ति शेष नहीं थी, जिसके साक्षात् दर्शन कमलेश ने न किए हांे। पर ये संघर्ष, विपत्तियां, आपदाएं, धोखे आदि उसे कोई न कोई शिक्षा देकर ही गए हैं। कहावत है कि -“मनुष्य ठोकर खाकर ही सीखता है “। परन्तु इस प्रकार के मनुष्य प्रगति के पथ पर बहुत आगे नहीं जा पाते, जब तक कि भाग्य उनके साथ न हो। वस्तुतः ठोकर खाकर सीखने वाले मनुष्य को ज्ञानी नहीं कहा जा सकता है। ज्ञानी तो वह मनुष्य है जो दूसरों को ठोकर खाता देखकर स्वयं शिक्षा ले और वहाँ पर ठोकर खाने से बच जाए। पिता और संरक्षक की छत्रछाया के बिना पले-बढ़े कमलेश को समय ने ऐसा ही ज्ञानी बना दिया था। उसने दूसरों को जिस राह पर ठोकर खाकर गिरते देखा, उस राह पर या तो वह चला ही नहीं और यदि चलना अपरिहार्य हुआ तो इतना सम्भल कर चला कि ठोकर खाकर गिरने का प्रश्न ही नहीं।"

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