B-104/18.9.14
महराज गोपालदास दो दिन की इलाहाबाद यात्रा पर गए हुए थे। वहाँ“विश्व संत समागम“ में उन्हें भाग लेना था। महराज के आश्रम में न होने सेद्वार पर कोई विशेष सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती थी। अतः स्वामीमंगलेश्वर एवं उसके सभी साथी आश्रम के अहाते मे श्रद्धालुओं के कर्म काण्डपूर्ण करा रहे थे। कमलेश भी उनके साथ बैठा था। परन्तु वह अभी तक इनसब कार्यों में सम्मिलित नहीं हुआ था। इन कार्यों से प्राप्त आय के द्वारा हीमंगलेश्वर सहित सभी का खर्चा चलता था। इसी आय से ही नशा, मदिरा आदिका प्रबन्ध होता था। साथ में सबसे बड़ा खर्चा तो मांसाहार का था। मंगलेश्वरको रात्रि के भोजन में मांसाहार अवश्य चाहिए होता था। बीहड़ में तो पूराजीवन ही मांसाहार पर निर्भर होता था। यह प्रवृत्ती मंगलेश्वर को अभी भी थी।रात्रि में यदि मांसाहार न मिले तो वह भोजन ही नहीं करते थे। हरिद्वार मेंमांसाहार पूर्णरूप से प्रतिबन्धित था। यह व्यवस्था का दुर्भाग्य कहें याविडम्बना कि जिस वस्तु पर जहां प्रतिबन्ध होता है। वह वस्तु वहां उतनी हीअधिक सुलभ होती है। मात्र मूल्य बढ़ जाता है। अतः इन सब कार्यों में बहुतधन व्यय होता था। साथ ही जो आश्रम में भोजन बनाने वाले लोग थे, उनमें सेभी कुछ मांसाहारी थे। वो लोग ही इसे बनाकर चोरी छिपे इन लोगों कोउपलब्ध कराते थे। अतः उन लोगों के भोजन का खर्चा भी मंगलेश्वर हीउठाते थे। कमलेश इन सब में स्वामी मंगलेश्वर व उनके साथियों काभागीदार था। अतः धन अर्जन के लिए पूजा-यज्ञ में भी उसे बिना रूचि के,बाध्य होकर इन लोगों के साथ बैठना पड़ता था।
वाहनों का भोंपू (हाॅर्न) सुनाई दिया। इसके साथ ही स्वामी मंगलेश्वर वउनके साथी भाग खड़े हुए। कमलेश की कुछ समझ में नहीं आया। जब तकवह कुछ समझने का प्रयास करता, वाहनों की श्रंृखला उसी के पास आकररूकी। रूकते ही अनेक साधु कूद कर वाहनों से बाहर निकले और आगे वालेवाहन को घेर कर खड़े हो गए। आगे वाले वाहन का द्वार खुला। उसमें से एकगेरूए वस्त्र धारण किए आकर्षक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बाहर निकला।मूल्यवान वेश भूषा,कानों में कुण्डल, खुली हुई जटा, सोने में मढ़ी हुई रूद्राक्षकी कई मालाएं गले में धारण किए, रत्नजडि़त अंगूठियां हाथों की शोभा बढ़ारही थीं। उसके उतरते ही सभी श्रद्धालु उधर भागे, जब तक साधु के भेष मेंउसके अंगरक्षक श्रद्धालुओं को रोकते, उनमें से कई उस व्यक्ति के चरणोंको स्पर्श करने लगे। सभी श्रद्धालु जय जयकार करने लगे। तब जाकरकमलेश को पता चला कि यही महराज गोपालदास स्वामी हंै। उसने भी चरणस्पर्श करने का प्रयास किया, पर उसे रोक दिया गया। महराज श्रद्धालुओं कीभीड़ के बीच से होते हुए स्वयं कमलेश की तरफ बढ़े। उन्होंने कुछ पल यज्ञकी जल रही अग्नि, पोथी-पत्रा और पूजा सामग्री को देखा, फिर कमलेश कोतीखी दृष्टि से देखा। कमलेश को यह सब दृश्य देखकर कुछ भी समझ में नहींआया। महराज बोले-

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