“तुमने ही बताया कि तुम्हारा नाम बच्चा-बच्चा जानता था। तुम्हारी यह बात सच है कि तुम्हंे बच्चा-बच्चा जानता था और मैं उस समय सच में बच्चा था। पर फिर यह सूचना मिली कि तुम्हें मुठभेड़ में मार दिया गया है।“ बात कड़वी थी, पर थी सोलह आने सच्ची। मंगलेश्वर आंख मूंद कर विचारों में खो गए। जब वह बीहड़ में मात्र सत्रह वर्ष की आयु में घर-द्वार, परिवार , रिश्ते सब त्याग कर बागी बनकर आया था तो उसे लेश मात्र कभी किसी बात का भय नहीं हुआ। उसने अकेले अपने बल पर गिरोह बनाया। दिनदहाड़े डकैतियां डालता था। न जाने कितने लोग उसकी गोली का शिकार हुए। एक कप्तान सहित न जाने कितने पुलिस वाले शहीद हुए। उसके नाम पर कई वर्षों तक सरकार ने अभियान चलाया। पर उसने निडर होकर मोर्चा लिया और कभी हत्थे नहीं चढ़ा। उसके गिरोह का सिद्धान्त था कि ‘‘हमारे एक साथी के बदले दस खाकी“। किन्तु जैस-जैसे उसके पास पैसा आता गया एवं जीवन विलासतापूर्ण होता गया, उसके अन्दर जीवन के प्रति मोह उत्पन्न होता गया। जीवन के प्रति इस मोह ने उसकी निश्चिन्तता समाप्त कर दी। उसे अब पुलिस तो दूर, अपने साथियों से ही संकट लगने लगा। वह सभी को संदेह की दृष्टि से देखने लगा। जरा सी शंका होने पर वह अपने गिरोह के सदस्यों के प्राण ले लेता था। उसके इस आचरण से गिरोह में फूट पड़ने लगी। वह शत्रुओं और पुलिस से टक्कर लेने की जगह उनसे छिपते फिरने लगा। उसके इस आचरण ने उसे भीतर से खोखला बना दिया। उसकी निर्भीकता और आत्मविश्वास उसका साथ छोड़ने लगे। बस यहीं से उसके जीवन की उल्टी गिनती प्रारंभ हो गयी। उसके ही एक साथी की सूचना (मुखबरी) पर पुलिस ने भारी बल के साथ उसके गिरोह को घेर लिया। सारे साथियों को आगे करके वह वहां से चुपचाप एक साथी के साथ खिसक लिया। सभी साथी पुलिस से मुठभेड़ में मारे गए। पुलिस को यह आभास नहीं था कि “मंगला कहार“ यूँ साथियों को आगे करके उन्हें उलझा देगा और स्वयं चुपचाप भाग लेगा। पुलिस जानती थी कि यह मंगला के स्वभाव में नहीं है। वह अपने साथियों के साथ अंत तक लोहा लेगा। परन्तु पुलिस धोखा खा गई। भाग्य मंगला को बीहड़ से पहाड़ों में ले आया। हरिद्वार आकर वह छिप कर रहने लगा। किन्तु यहां का वातावरण उसे बीहड़ से भी अधिक भयावह लगा। उसे लगता था कि यहां पग-पग पर धोखा है। यहां का मुनष्य वो नहीं है, जो प्रतीत होता है। जीवन के मोह ने मंगला को हरिद्वार में भिक्षुओं की भाँति जीवन यापन करने को बाध्य कर दिया। सदैव सम्मान एंव स्वाभिमान का जीवन जीने वाले मंगला को यहां प्रत्येक क्षण पराधीनता के बोध में व्यतीत करना पड़ता था। न भोजन की व्यवस्था, न रहने का आश्रय। मठों में झाडू लगाने से लेकर, भोजन बनाने, मठाधीशों- महन्तों के पैर दबाने और उनकी चाकरी करने तक का कार्य किया। फिर भी उसे किसी ने स्थायी आश्रय नहीं दिया। तीन वर्ष पश्चात् उसे सूचना मिली कि “मंगला कहार“ डकैत को पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया। समाचार पत्र में प्रकाशित चित्र भी उसके जवानी के समय का था। पुलिस की यह गुत्थी तो वह आज तक नहीं सुलझा पाया। किन्तु इस सूचना ने उसके भीतर के डूब रहे आत्मविश्वास को थोड़ा सहारा अवश्य दिया। उसे यह विश्वास हो गया कि अब वह पुलिस से सुरक्षित हो गया है। किन्तु इस आत्मविश्वास ने उसे बड़बोला बना दिया। अब वह फिर से “मंगला कहार“ बन कर शासन करना चाहता था। परन्तु हरि की इस नगरी में तो लगता था कि प्रत्येक मनुष्य घाट-घाट का पानी पीकर गंगा घाट आया था। किसी ने उसे ’’मंगला कहार’’ तो दूर, ’’स्वामी मंगलेश्वर’’ नाम के साधु के बराबर भी नहीं समझा। धीरे-धीरे कारागार एंव पुलिस की अभिरक्षा से भागे चोर-उच्चक्कों से उसकी संगत अवश्य हो गयी। उन्हीं के साथ वह दाढ़ी-बाल बढ़ा कर गेरूए वस्त्र में रहते थे। हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं में से एक -दो भी यदि दिन भर में इनकी ठगी का शिकार हो जाते थे तो इन लोगों के खाने-पीने और नशे आदि की व्यवस्था हो जाती थी। मंगलेश्वर की महत्वाकांक्षा भी अब जोर मारने लगी। उन्हें अब प्रतीत होने लगा कि अपराधी के रूप में इस समाज में अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता है। मात्र धर्म से ही, दूसरे शब्दों में धर्म की आड़ में ही उस ऊँचाई की प्राप्ति कर सकते है, जिसके वह स्वप्न देखते रहे हैं। विश्व का प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक होता है। यह मनुष्य की वह प्रकृति है, जो उसे अन्य जीवों से अलग करती है। होश सम्भालने के साथ ही मनुष्य को कोई न कोई सहारा चाहिए होता है। वही सहारा उसकी आस्था होती है। वह माता-पिता या किसी अन्य संरक्षक के रूप में होती है। जब यह सहारा उससे अलग होता है या इन सहारों से ही उसे ठेस पहुँचती है या ये सहारे उसकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते हैं तो वह आलौकिक या दिव्य शाक्तियों में आश्रय खोजता है। यदि किसी मनुष्य को जन्म से ही धर्म,शास्त्रों, पुराणों आदि की औपचारिक या अनौपचारिक शिक्षा दी जाए तो वह मनुष्य ज्ञानी, विद्वान, तो हो सकता है। किन्तु आलौकिक और दिव्य शाक्तियों में उसका विश्वास और आस्था हो, इस बात की निश्चिन्तता नहीं है। आलौकिक और दिव्य शक्तियों में आस्था एवं विश्वास की व्याख्या ‘धर्म’ के रूप में की जा सकती है। किन्तु धर्म के इस रूप में मनुष्य का जुड़ाव तभी होता है जब वह विरक्त, असहाय, निराश्रित होता है। अन्यथा समान्य रूप में मनुष्य जिस धर्म की बात करता है। उस धर्म में आस्था के कई अलग-अलग कारण हंै। अधिकांश लोग इस तथाकथित धर्म में भयवश आस्था रखते हैं। धर्म के ठेकेदारों ने आदि काल से इसकी प्रस्तुति समाज में इस प्रकार से की है कि मनुष्य अनिष्ट से बचने के लिए धर्म की महत्ता को स्वीकार करता है, न कि आस्था के फलस्वरूप। कुछ लोग अपनी योग्यता, कर्म और क्षमता से अधिक की प्राप्ति की लालसा में धर्म की शरण में जाते हैं। कुछ जब विपत्ति काल में कोई राह नहीं सूझती तो धर्म की शरण में जाते हैं। कुछ इसलिए कि जो कुछ उनके पास है वह यूं ही बना रहे, धर्म की शरण में जाते हैं। इन सबके अतिरिक्त धर्म की समाज में एक और भूमिका समाहित कर दी गई है, वह है रीति-रिवाज, कर्म-काण्ड आदि। जो मनुष्य के जीवन से लेकर मृत्यु तक उसके साथ अनिवार्य रूप से जुड़े रहते हैं।

1 Comments:
बहुत सुन्दर....
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