Monday, 4 August 2014

my next book 'mahant-the godfather

मित्रों ,
मैं अपनी शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक "महंत -द गॉडफादर" के अंश अपने
फेसबुक पेज "महंत -द गॉडफादर" व ब्लॉग पर प्रस्तुत कर रहा हुँ,आशा है आप हमारे 
फेसबुक पेज @authoramitabh व 
ब्लॉग authoramitabh.blogspot.in को "LIKE" करेंगे तथा आप सबका स्नेह सदा की भांति हमें प्राप्त होगा।
Twitter-@authoramitabh
"धर्म समाज को एक करता है या समाज की एकता को खंडित करता है? यह एक वृहद परिचर्चा का विषय है। अतः इस विषय की व्याख्या में हम आपका समय व्यर्थ नहीं करेंगे। एक तरफ जहां धर्म समाज के अलग-अलग समूहों और जातियों में बंटे लोगों को एक करने का सशक्त साधन है। वहीं दूसरी ओर “वसुधैव कुटुम्बकम्“ में बाधा भी!
भारतीय समाज में धर्म की स्थापना और उसकी सेवा के लिए एक वर्ग बनाया गया। यह इसलिए आवश्यक था कि भारतीय सनातन धर्म, जिसे आज हम “हिन्दू धर्म“ कहते हैं, उसमें तैंतीस करोड़ देवी -देवता हैं। अर्थात् देवी-देवताओं की संख्या उन्हें पूजने वालों से अधिक थी। इस वर्ग का यह कार्य था कि वह धर्म और उसके ग्रन्थों का अध्ययन कर समाज को शिक्षित करे, जिससे कि लोग धर्मानुकूल कार्य करें। यह धर्म के सेवक पहले धर्म के रक्षक बने, फिर अनुपालक, फिर दण्डाधिकारी ! धर्म सेवा के माध्यम से जीविका साधन, फिर शासन का माध्यम, अब अनेक लोगो के लिए भोग विलासता के लिए आसान मार्ग हो गया है। भारतीय धर्म अब किसी विशेष वर्ग से नियंत्रित नहीं होता है। अब जिसे अवसर मिलता है, वही धर्म का उपयोग अपने निजी हित में कर रहा है।
जहां भारतीय सनातन धर्म इतना सहृदयी है कि एक चींटी की हत्या को भी पाप मानता है तथा गाय को माँ समान मानता है। वहीं यह धर्म इतना कठोर है कि अंत्येष्टि के लिए रखे पार्थिव शरीर को मुखाग्नि तब तक नहीं दे सकते हैं, जब तक कि रोते-बिलखते परिजन सभी औपचारिकताएं पूरी न कर लें। फिर अस्थि विसर्जन, पिण्ड दान, ब्रह्म भोज, शांति पाठ, तेरहवीं आदि। अपने प्रियजन की आत्मा को मोक्ष दिलाने का मूल्य तो देना ही पड़ेगा न! इसका कारण बताया गया, समाज का अशिक्षित होना। परन्तु आज तो समाज शिक्षित हो रहा है। जैसे-जैसे समाज शिक्षित होता जा रहा है, प्रतीत होता है कि समाज उतना ही अंधविश्वासी होता जा रहा है। छोटे-मोटे वैज्ञानिक तरीकों को ईश्वर का चमत्कार और उसके द्वारा प्रदत्त शक्ति कहकर पढ़े लिखे समाज को मूर्ख बना कर लोग धर्म के नाम पर अपना हित साध रहे हैं। जहां धर्म निर्धन व्यक्ति के लिए इतना कठोर है कि एक निर्धन अपने परिजन की अन्तेष्टि बिना धन के नहीं कर सकता, चाहे उसे कर्जा या सूद पर धन लेना पड़े कहा जाता है कि अन्तेष्टि के लिए दूसरा धन खर्च नहीं कर सकता है। वहीं धनाढ़य व समृद्ध लोगों के लिए यह धर्म इतना सहृदयी है कि इनके लिए बड़े-बड़े धर्म स्थलों, मठों के कपाट सामान्य जन के लिए बन्द करके, इनको घण्टों पूजा-अर्चना की अनुमति देता है।"

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home