Thursday, 18 September 2014

B-106/18.9.14

चमत्कारी मित्र-

प्रकाशक और हमारे मित्र नीरज जी ने मेरी पुस्तक "महन्त-द गाॅडफादर" को छापने का ख़तरा मोल लिया (मुझ जैसे संघर्षरत लेखक की पुस्तक छापना प्रकाशक के लिए ख़तरा मोल लेना ही है)।आज अकस्मात आकर पुस्तक सामने रख दी और बोले आपकी पुस्तक कल से लखनऊ में प्रारम्भ हो रहे "राष्ट्रीय पुस्तक मेला" में दिव्यांश पब्लिकेशंस के स्टाल नम्बर 98 पर उपलब्ध रहेगी।

इन्होंने मुझसे कहा था कि मैं पूरा प्रयास करके पुस्तक अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में ही उपलब्ध करा पाऊँगा,पर आज लेकर प्रस्तुत हो गए।अब मैं इन्हें धोखेबाज़ कहूं या चमत्कारी !!जो भी कहूँ इन्हें,पर आज दिन मेरे लिए अविस्मरणीय कर दिया नीरज जी नें।।निःशब्द और स्तब्ध हूँ।।

Wednesday, 17 September 2014

B-105/18.9.14

Releasing on 2nd oct,my up coming book "Manat-The God Father".

I am sharing it on my blog also.

 पुस्तक से-

"कमलेश यह भी भलीभांति जानता था कि महराज से “व्यवहारिक ज्ञान“ सीखने के लिए कुछ भी नहीं था। “व्यवहारिक ज्ञान“ का विश्वविद्यालय तो कमलेश स्वयं था। यह पाठ तो वह स्वयं महराज को पढ़ा सकता है। जीवन से बड़ी पाठशाला कोई नहीं है। जीवन में जितने संघर्ष होते हैं, उतना ही व्यवहारिक ज्ञान मनुष्य को होता है। कमलेश का जीवन तो संघर्षों का पर्याय था। जीवन का कोई ऐसा कष्ट, झंझावात, आपदा नहीं थी, जो उसने न झेली हो। लगभग प्रत्येक प्रकार के मनुष्यों से उसका सामना पड़ चुका था। पग-पग पर धोखा खाने के बाद अब जीवन में कोई ऐसी विपत्ति शेष नहीं थी, जिसके साक्षात् दर्शन कमलेश ने न किए हांे। पर ये संघर्ष, विपत्तियां, आपदाएं, धोखे आदि उसे कोई न कोई शिक्षा देकर ही गए हैं। कहावत है कि -“मनुष्य ठोकर खाकर ही सीखता है “। परन्तु इस प्रकार के मनुष्य प्रगति के पथ पर बहुत आगे नहीं जा पाते, जब तक कि भाग्य उनके साथ न हो। वस्तुतः ठोकर खाकर सीखने वाले मनुष्य को ज्ञानी नहीं कहा जा सकता है। ज्ञानी तो वह मनुष्य है जो दूसरों को ठोकर खाता देखकर स्वयं शिक्षा ले और वहाँ पर ठोकर खाने से बच जाए। पिता और संरक्षक की छत्रछाया के बिना पले-बढ़े कमलेश को समय ने ऐसा ही ज्ञानी बना दिया था। उसने दूसरों को जिस राह पर ठोकर खाकर गिरते देखा, उस राह पर या तो वह चला ही नहीं और यदि चलना अपरिहार्य हुआ तो इतना सम्भल कर चला कि ठोकर खाकर गिरने का प्रश्न ही नहीं।"

B-104/18.9.14

     महराज गोपालदास दो दिन की इलाहाबाद यात्रा पर गए हुए थे। वहाँविश्व संत समागम में उन्हें भाग लेना था। महराज के आश्रम में  होने सेद्वार पर कोई विशेष सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती थी। अतः स्वामीमंगलेश्वर एवं उसके सभी साथी आश्रम के अहाते मे श्रद्धालुओं के कर्म काण्डपूर्ण करा रहे थे। कमलेश भी उनके साथ बैठा था। परन्तु वह अभी तक इनसब कार्यों में सम्मिलित नहीं हुआ था। इन कार्यों से प्राप्त आय के द्वारा हीमंगलेश्वर सहित सभी का खर्चा चलता था। इसी आय से ही नशामदिरा आदिका प्रबन्ध होता था। साथ में सबसे बड़ा खर्चा तो मांसाहार का था। मंगलेश्वरको रात्रि के भोजन में मांसाहार अवश्य चाहिए होता था। बीहड़ में तो पूराजीवन ही मांसाहार पर निर्भर होता था। यह प्रवृत्ती मंगलेश्वर को अभी भी थी।रात्रि में यदि मांसाहार  मिले तो वह भोजन ही नहीं करते थे। हरिद्वार मेंमांसाहार पूर्णरूप से प्रतिबन्धित था। यह व्यवस्था का दुर्भाग्य कहें याविडम्बना कि जिस वस्तु पर जहां प्रतिबन्ध होता है। वह वस्तु वहां उतनी हीअधिक सुलभ होती है। मात्र मूल्य बढ़ जाता है। अतः इन सब कार्यों में बहुतधन व्यय होता था। साथ ही जो आश्रम में भोजन बनाने वाले लोग थेउनमें सेभी कुछ मांसाहारी थे। वो लोग ही इसे बनाकर चोरी छिपे इन लोगों कोउपलब्ध कराते थे। अतः उन लोगों के भोजन का खर्चा भी मंगलेश्वर हीउठाते थे। कमलेश इन सब में स्वामी मंगलेश्वर  उनके साथियों काभागीदार था। अतः धन अर्जन के लिए पूजा-यज्ञ में भी उसे बिना रूचि के,बाध्य होकर इन लोगों के साथ बैठना पड़ता था।

    वाहनों का भोंपू (हाॅर्नसुनाई दिया। इसके साथ ही स्वामी मंगलेश्वर उनके साथी भाग खड़े हुए। कमलेश की कुछ समझ में नहीं आया। जब तकवह कुछ समझने का प्रयास करतावाहनों की श्रंृखला उसी के पास आकररूकी। रूकते ही अनेक साधु कूद कर वाहनों से बाहर निकले और आगे वालेवाहन को घेर कर खड़े हो गए। आगे वाले वाहन का द्वार खुला। उसमें से एकगेरूए वस्त्र धारण किए आकर्षक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बाहर निकला।मूल्यवान वेश भूषा,कानों में कुण्डलखुली हुई जटासोने में मढ़ी हुई रूद्राक्षकी कई मालाएं गले में धारण किएरत्नजडि़त अंगूठियां हाथों की शोभा बढ़ारही थीं। उसके उतरते ही सभी श्रद्धालु उधर भागेजब तक साधु के भेष मेंउसके अंगरक्षक श्रद्धालुओं को रोकतेउनमें से कई उस व्यक्ति के चरणोंको स्पर्श करने लगे। सभी श्रद्धालु जय जयकार करने लगे। तब जाकरकमलेश को पता चला कि यही महराज गोपालदास स्वामी हंै। उसने भी चरणस्पर्श करने का प्रयास कियापर उसे रोक दिया गया। महराज श्रद्धालुओं कीभीड़ के बीच से होते हुए स्वयं कमलेश की तरफ बढ़े। उन्होंने कुछ पल यज्ञकी जल रही अग्निपोथी-पत्रा और पूजा सामग्री को देखाफिर कमलेश कोतीखी दृष्टि से देखा। कमलेश को यह सब दृश्य देखकर कुछ भी समझ में नहींआया। महराज बोले-

Monday, 15 September 2014

“तुमने ही बताया कि तुम्हारा नाम बच्चा-बच्चा जानता था। तुम्हारी यह बात सच है कि तुम्हंे बच्चा-बच्चा जानता था और मैं उस समय सच में बच्चा था। पर फिर यह सूचना मिली कि तुम्हें मुठभेड़ में मार दिया गया है।“ बात कड़वी थी, पर थी सोलह आने सच्ची। मंगलेश्वर आंख मूंद कर विचारों में खो गए। जब वह बीहड़ में मात्र सत्रह वर्ष की आयु में घर-द्वार, परिवार , रिश्ते सब त्याग कर बागी बनकर आया था तो उसे लेश मात्र कभी किसी बात का भय नहीं हुआ। उसने अकेले अपने बल पर गिरोह बनाया। दिनदहाड़े डकैतियां डालता था। न जाने कितने लोग उसकी गोली का शिकार हुए। एक कप्तान सहित न जाने कितने पुलिस वाले शहीद हुए। उसके नाम पर कई वर्षों तक सरकार ने अभियान चलाया। पर उसने निडर होकर मोर्चा लिया और कभी हत्थे नहीं चढ़ा। उसके गिरोह का सिद्धान्त था कि ‘‘हमारे एक साथी के बदले दस खाकी“। किन्तु जैस-जैसे उसके पास पैसा आता गया एवं जीवन विलासतापूर्ण होता गया, उसके अन्दर जीवन के प्रति मोह उत्पन्न होता गया। जीवन के प्रति इस मोह ने उसकी निश्चिन्तता समाप्त कर दी। उसे अब पुलिस तो दूर, अपने साथियों से ही संकट लगने लगा। वह सभी को संदेह की दृष्टि से देखने लगा। जरा सी शंका होने पर वह अपने गिरोह के सदस्यों के प्राण ले लेता था। उसके इस आचरण से गिरोह में फूट पड़ने लगी। वह शत्रुओं और पुलिस से टक्कर लेने की जगह उनसे छिपते फिरने लगा। उसके इस आचरण ने उसे भीतर से खोखला बना दिया। उसकी निर्भीकता और आत्मविश्वास उसका साथ छोड़ने लगे। बस यहीं से उसके जीवन की उल्टी गिनती प्रारंभ हो गयी। उसके ही एक साथी की सूचना (मुखबरी) पर पुलिस ने भारी बल के साथ उसके गिरोह को घेर लिया। सारे साथियों को आगे करके वह वहां से चुपचाप एक साथी के साथ खिसक लिया। सभी साथी पुलिस से मुठभेड़ में मारे गए। पुलिस को यह आभास नहीं था कि “मंगला कहार“ यूँ साथियों को आगे करके उन्हें उलझा देगा और स्वयं चुपचाप भाग लेगा। पुलिस जानती थी कि यह मंगला के स्वभाव में नहीं है। वह अपने साथियों के साथ अंत तक लोहा लेगा। परन्तु पुलिस धोखा खा गई। भाग्य मंगला को बीहड़ से पहाड़ों में ले आया। हरिद्वार आकर वह छिप कर रहने लगा। किन्तु यहां का वातावरण उसे बीहड़ से भी अधिक भयावह लगा। उसे लगता था कि यहां पग-पग पर धोखा है। यहां का मुनष्य वो नहीं है, जो प्रतीत होता है। जीवन के मोह ने मंगला को हरिद्वार में भिक्षुओं की भाँति जीवन यापन करने को बाध्य कर दिया। सदैव सम्मान एंव स्वाभिमान का जीवन जीने वाले मंगला को यहां प्रत्येक क्षण पराधीनता के बोध में व्यतीत करना पड़ता था। न भोजन की व्यवस्था, न रहने का आश्रय। मठों में झाडू लगाने से लेकर, भोजन बनाने, मठाधीशों- महन्तों के पैर दबाने और उनकी चाकरी करने तक का कार्य किया। फिर भी उसे किसी ने स्थायी आश्रय नहीं दिया। तीन वर्ष पश्चात् उसे सूचना मिली कि “मंगला कहार“ डकैत को पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया। समाचार पत्र में प्रकाशित चित्र भी उसके जवानी के समय का था। पुलिस की यह गुत्थी तो वह आज तक नहीं सुलझा पाया। किन्तु इस सूचना ने उसके भीतर के डूब रहे आत्मविश्वास को थोड़ा सहारा अवश्य दिया। उसे यह विश्वास हो गया कि अब वह पुलिस से सुरक्षित हो गया है। किन्तु इस आत्मविश्वास ने उसे बड़बोला बना दिया। अब वह फिर से “मंगला कहार“ बन कर शासन करना चाहता था। परन्तु हरि की इस नगरी में तो लगता था कि प्रत्येक मनुष्य घाट-घाट का पानी पीकर गंगा घाट आया था। किसी ने उसे ’’मंगला कहार’’ तो दूर, ’’स्वामी मंगलेश्वर’’ नाम के साधु के बराबर भी नहीं समझा। धीरे-धीरे कारागार एंव पुलिस की अभिरक्षा से भागे चोर-उच्चक्कों से उसकी संगत अवश्य हो गयी। उन्हीं के साथ वह दाढ़ी-बाल बढ़ा कर गेरूए वस्त्र में रहते थे। हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं में से एक -दो भी यदि दिन भर में इनकी ठगी का शिकार हो जाते थे तो इन लोगों के खाने-पीने और नशे आदि की व्यवस्था हो जाती थी। मंगलेश्वर की महत्वाकांक्षा भी अब जोर मारने लगी। उन्हें अब प्रतीत होने लगा कि अपराधी के रूप में इस समाज में अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता है। मात्र धर्म से ही, दूसरे शब्दों में धर्म की आड़ में ही उस ऊँचाई की प्राप्ति कर सकते है, जिसके वह स्वप्न देखते रहे हैं। विश्व का प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक होता है। यह मनुष्य की वह प्रकृति है, जो उसे अन्य जीवों से अलग करती है। होश सम्भालने के साथ ही मनुष्य को कोई न कोई सहारा चाहिए होता है। वही सहारा उसकी आस्था होती है। वह माता-पिता या किसी अन्य संरक्षक के रूप में होती है। जब यह सहारा उससे अलग होता है या इन सहारों से ही उसे ठेस पहुँचती है या ये सहारे उसकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते हैं तो वह आलौकिक या दिव्य शाक्तियों में आश्रय खोजता है। यदि किसी मनुष्य को जन्म से ही धर्म,शास्त्रों, पुराणों आदि की औपचारिक या अनौपचारिक शिक्षा दी जाए तो वह मनुष्य ज्ञानी, विद्वान, तो हो सकता है। किन्तु आलौकिक और दिव्य शाक्तियों में उसका विश्वास और आस्था हो, इस बात की निश्चिन्तता नहीं है। आलौकिक और दिव्य शक्तियों में आस्था एवं विश्वास की व्याख्या ‘धर्म’ के रूप में की जा सकती है। किन्तु धर्म के इस रूप में मनुष्य का जुड़ाव तभी होता है जब वह विरक्त, असहाय, निराश्रित होता है। अन्यथा समान्य रूप में मनुष्य जिस धर्म की बात करता है। उस धर्म में आस्था के कई अलग-अलग कारण हंै। अधिकांश लोग इस तथाकथित धर्म में भयवश आस्था रखते हैं। धर्म के ठेकेदारों ने आदि काल से इसकी प्रस्तुति समाज में इस प्रकार से की है कि मनुष्य अनिष्ट से बचने के लिए धर्म की महत्ता को स्वीकार करता है, न कि आस्था के फलस्वरूप। कुछ लोग अपनी योग्यता, कर्म और क्षमता से अधिक की प्राप्ति की लालसा में धर्म की शरण में जाते हैं। कुछ जब विपत्ति काल में कोई राह नहीं सूझती तो धर्म की शरण में जाते हैं। कुछ इसलिए कि जो कुछ उनके पास है वह यूं ही बना रहे, धर्म की शरण में जाते हैं। इन सबके अतिरिक्त धर्म की समाज में एक और भूमिका समाहित कर दी गई है, वह है रीति-रिवाज, कर्म-काण्ड आदि। जो मनुष्य के जीवन से लेकर मृत्यु तक उसके साथ अनिवार्य रूप से जुड़े रहते हैं।

Saturday, 13 September 2014

B-103

महंत-द गॉडफादर
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पुस्तक के अंश-
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Releasing on 2nd October.
Dear Friends,
It's my pleasure to share with you that my upcoming book "Mahant - The Godfather" is releasing on 2nd October. I am sharing my book at my Blog/Facebook page/ Twitter. Hope that you will visit and bless my effort.

Monday, 1 September 2014

#मर्दानी- Women empowerment के नाम पर आजकल वाहवाही लूट रही यह फ़िल्म पुरूष प्रधान समाज का विभत्स रूप व महिलाओं को उनकी शक्ति का आभास कराने के प्रयास में सफल रही। परन्तु यह भी एक विचित्र विडम्बना है कि महिलाओं की शक्ति का नामांकन करने के लिए आज भी #मर्दानी शब्द पुरूषों से उधार लेना पड़ रहा है!!आज के समय में जब महिला पुरूषों को हर क्षेत्र में चुनौती दे रही है तब भी आज तक उसकी शक्ति को नया नाम नहीं दिया जा सका!!साहस,वीरता और निडरता के लिए क्या सदैव #मर्दानगी शब्द ही प्रयोग होता रहेगा,वो भी महिला सशक्तिकरण के लिए!!!उससे भी ज़्यादा दुःखद है आज भा #जनानी शब्द का उपयोग!!जो कि इसके कायरता आदि के लिए प्रयोग हो रहा है। वो दौर और था जब कोई स्त्री समाजिक बंधनों को तोड़ कर रानी लक्ष्मीबाई बनी और कहा गया "ख़ूब लड़ी #मर्दानी"!! समय बदल गया है,मान्यताएँ भी बदलनी होंगी।