Ak-144AK-145 "मैँ जानता हूँ कैसे बदल जाते हैँ लोग अक्सर, मैँने कई बार अपने अन्दर किसी और को देखा हैँ."
लेखक,सामाजिक कार्यकर्ता व रेलवे अधिकारी
चमत्कारी मित्र-
प्रकाशक और हमारे मित्र नीरज जी ने मेरी पुस्तक "महन्त-द गाॅडफादर" को छापने का ख़तरा मोल लिया (मुझ जैसे संघर्षरत लेखक की पुस्तक छापना प्रकाशक के लिए ख़तरा मोल लेना ही है)।आज अकस्मात आकर पुस्तक सामने रख दी और बोले आपकी पुस्तक कल से लखनऊ में प्रारम्भ हो रहे "राष्ट्रीय पुस्तक मेला" में दिव्यांश पब्लिकेशंस के स्टाल नम्बर 98 पर उपलब्ध रहेगी।
इन्होंने मुझसे कहा था कि मैं पूरा प्रयास करके पुस्तक अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में ही उपलब्ध करा पाऊँगा,पर आज लेकर प्रस्तुत हो गए।अब मैं इन्हें धोखेबाज़ कहूं या चमत्कारी !!जो भी कहूँ इन्हें,पर आज दिन मेरे लिए अविस्मरणीय कर दिया नीरज जी नें।।निःशब्द और स्तब्ध हूँ।।
Releasing on 2nd oct,my up coming book "Manat-The God Father".
I am sharing it on my blog also.
पुस्तक से-
"कमलेश यह भी भलीभांति जानता था कि महराज से “व्यवहारिक ज्ञान“ सीखने के लिए कुछ भी नहीं था। “व्यवहारिक ज्ञान“ का विश्वविद्यालय तो कमलेश स्वयं था। यह पाठ तो वह स्वयं महराज को पढ़ा सकता है। जीवन से बड़ी पाठशाला कोई नहीं है। जीवन में जितने संघर्ष होते हैं, उतना ही व्यवहारिक ज्ञान मनुष्य को होता है। कमलेश का जीवन तो संघर्षों का पर्याय था। जीवन का कोई ऐसा कष्ट, झंझावात, आपदा नहीं थी, जो उसने न झेली हो। लगभग प्रत्येक प्रकार के मनुष्यों से उसका सामना पड़ चुका था। पग-पग पर धोखा खाने के बाद अब जीवन में कोई ऐसी विपत्ति शेष नहीं थी, जिसके साक्षात् दर्शन कमलेश ने न किए हांे। पर ये संघर्ष, विपत्तियां, आपदाएं, धोखे आदि उसे कोई न कोई शिक्षा देकर ही गए हैं। कहावत है कि -“मनुष्य ठोकर खाकर ही सीखता है “। परन्तु इस प्रकार के मनुष्य प्रगति के पथ पर बहुत आगे नहीं जा पाते, जब तक कि भाग्य उनके साथ न हो। वस्तुतः ठोकर खाकर सीखने वाले मनुष्य को ज्ञानी नहीं कहा जा सकता है। ज्ञानी तो वह मनुष्य है जो दूसरों को ठोकर खाता देखकर स्वयं शिक्षा ले और वहाँ पर ठोकर खाने से बच जाए। पिता और संरक्षक की छत्रछाया के बिना पले-बढ़े कमलेश को समय ने ऐसा ही ज्ञानी बना दिया था। उसने दूसरों को जिस राह पर ठोकर खाकर गिरते देखा, उस राह पर या तो वह चला ही नहीं और यदि चलना अपरिहार्य हुआ तो इतना सम्भल कर चला कि ठोकर खाकर गिरने का प्रश्न ही नहीं।"
महराज गोपालदास दो दिन की इलाहाबाद यात्रा पर गए हुए थे। वहाँ“विश्व संत समागम“ में उन्हें भाग लेना था। महराज के आश्रम में न होने सेद्वार पर कोई विशेष सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती थी। अतः स्वामीमंगलेश्वर एवं उसके सभी साथी आश्रम के अहाते मे श्रद्धालुओं के कर्म काण्डपूर्ण करा रहे थे। कमलेश भी उनके साथ बैठा था। परन्तु वह अभी तक इनसब कार्यों में सम्मिलित नहीं हुआ था। इन कार्यों से प्राप्त आय के द्वारा हीमंगलेश्वर सहित सभी का खर्चा चलता था। इसी आय से ही नशा, मदिरा आदिका प्रबन्ध होता था। साथ में सबसे बड़ा खर्चा तो मांसाहार का था। मंगलेश्वरको रात्रि के भोजन में मांसाहार अवश्य चाहिए होता था। बीहड़ में तो पूराजीवन ही मांसाहार पर निर्भर होता था। यह प्रवृत्ती मंगलेश्वर को अभी भी थी।रात्रि में यदि मांसाहार न मिले तो वह भोजन ही नहीं करते थे। हरिद्वार मेंमांसाहार पूर्णरूप से प्रतिबन्धित था। यह व्यवस्था का दुर्भाग्य कहें याविडम्बना कि जिस वस्तु पर जहां प्रतिबन्ध होता है। वह वस्तु वहां उतनी हीअधिक सुलभ होती है। मात्र मूल्य बढ़ जाता है। अतः इन सब कार्यों में बहुतधन व्यय होता था। साथ ही जो आश्रम में भोजन बनाने वाले लोग थे, उनमें सेभी कुछ मांसाहारी थे। वो लोग ही इसे बनाकर चोरी छिपे इन लोगों कोउपलब्ध कराते थे। अतः उन लोगों के भोजन का खर्चा भी मंगलेश्वर हीउठाते थे। कमलेश इन सब में स्वामी मंगलेश्वर व उनके साथियों काभागीदार था। अतः धन अर्जन के लिए पूजा-यज्ञ में भी उसे बिना रूचि के,बाध्य होकर इन लोगों के साथ बैठना पड़ता था।
वाहनों का भोंपू (हाॅर्न) सुनाई दिया। इसके साथ ही स्वामी मंगलेश्वर वउनके साथी भाग खड़े हुए। कमलेश की कुछ समझ में नहीं आया। जब तकवह कुछ समझने का प्रयास करता, वाहनों की श्रंृखला उसी के पास आकररूकी। रूकते ही अनेक साधु कूद कर वाहनों से बाहर निकले और आगे वालेवाहन को घेर कर खड़े हो गए। आगे वाले वाहन का द्वार खुला। उसमें से एकगेरूए वस्त्र धारण किए आकर्षक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बाहर निकला।मूल्यवान वेश भूषा,कानों में कुण्डल, खुली हुई जटा, सोने में मढ़ी हुई रूद्राक्षकी कई मालाएं गले में धारण किए, रत्नजडि़त अंगूठियां हाथों की शोभा बढ़ारही थीं। उसके उतरते ही सभी श्रद्धालु उधर भागे, जब तक साधु के भेष मेंउसके अंगरक्षक श्रद्धालुओं को रोकते, उनमें से कई उस व्यक्ति के चरणोंको स्पर्श करने लगे। सभी श्रद्धालु जय जयकार करने लगे। तब जाकरकमलेश को पता चला कि यही महराज गोपालदास स्वामी हंै। उसने भी चरणस्पर्श करने का प्रयास किया, पर उसे रोक दिया गया। महराज श्रद्धालुओं कीभीड़ के बीच से होते हुए स्वयं कमलेश की तरफ बढ़े। उन्होंने कुछ पल यज्ञकी जल रही अग्नि, पोथी-पत्रा और पूजा सामग्री को देखा, फिर कमलेश कोतीखी दृष्टि से देखा। कमलेश को यह सब दृश्य देखकर कुछ भी समझ में नहींआया। महराज बोले-